क्या चिकन में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल, बढ़ा रहा है कैंसर का खतरा?

क्या स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक के कारण कैंसर की वजह बन रही हैं मुर्गियां?

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फिट हिंदी
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क्या इससे कैंसर होता है?
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दावा

हमारे पास एक वीडियो के साथ भेजे गए मैसेज में दावा किया गया है कि मुर्गियों को मोटा करने के लिए स्टेरॉयड, एंटीबायोटिक और ग्रोथ हार्मोन दिया जाता है. इस मैसेज में कहा गया है कि इस तरह के चिकन को खाना बहुत खतरनाक होता है और ये मुर्गियां कैंसरकारक होती हैं.

क्या चिकन में एंटीबायोटिक का इस्तेमाल, बढ़ा रहा है कैंसर का खतरा?
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आमतौर पर एंटीबायोटिक खाने या पानी में मिला कर दिया जाता है.
आमतौर पर एंटीबायोटिक खाने या पानी में मिला कर दिया जाता है.
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क्या मुर्गियों को दिया जाता है एंटीबायोटिक और स्टेरॉयड?

सेंटर फॉर डिजीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी (CDDEP) की साउथ एशिया हेड ज्योति जोशी बताती हैं कि भारत में पोल्ट्री फॉर्मों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट डेटा नहीं हैं, लेकिन औद्योगिक लाभ के लिए इनका उपयोग होता है.

भारत में ग्रोथ प्रमोटर के तौर पर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल खासकर पोल्ट्री में बहुत आम है, हालांकि इनका उपयोग कितनी मात्रा में किया जाता है, इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.

वहीं मेल टुडे की 2017 में आई इस रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि हरियाणा के पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों और चूजे को स्टेरॉयड और एंटीबायोटिक दिया जाता है ताकि उनकी फिजिकल ग्रोथ जल्दी हो सके.

CDDEP के डायरेक्टर प्रो रामानन लक्ष्मीनारायण क्विंट फिट के इस वीडियो में बताते हैं कि अमेरिकी वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि एंटीबायोटिक का लो डोज देने भर से ही चिकन तेजी से बढ़ते हैं. इसीलिए अब जानवरों पर एंटीबायोटिक का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है.

क्या ये मुर्गियां कैंसरकारक होती हैं?

नई दिल्ली के अपोलो कैंसर इंस्टिट्यूट में ऑन्कोलॉजी एंड रोबोटिक्स के सीनियर कंसल्टेंट डॉ समीर कौल इन मुर्गियों के सेवन से कैंसर होने के दावे से इनकार करते हैं.

इस बात को प्रमाणित करने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है और इसीलिए इस तरह का दावा नहीं किया जा सकता है, हालांकि एक्सपर्ट्स मीट की क्वालिटी पर ध्यान देने की बात जरूर करते हैं.

एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस: असल में ये है चुनौती

प्रो लक्ष्मीनारायण हरेक मुर्गी को एंटीबायोटिक दिया जाना बेहद खतरनाक बताते हैं.

दरअसल एंटीबायोटिक एक दवा है, जिसका इस्तेमाल उसी तरह होना चाहिए. बिना वजह इनका इस्तेमाल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की चुनौती बढ़ा रहा है.

प्रो जोशी कहती हैं कि एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के बड़े खतरे हैं और इसके खतरों से निपटने के लिए हमें एंटीबायोटिक फ्री मीट की मांग करनी चाहिए. वो बताती हैं कि अमेरिका में उपभोक्ताओं की मांग पर ही कई फूड चेन अब एंटीबायोटिक-फ्री चिकन देते हैं.

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस को साल 2019 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की ओर से 10 वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल किया गया है और इसके कारण हर साल करीब 7 लाख लोगों की जान जाती है.

इंसानों द्वारा खाए जाने वाले जानवरों या पक्षियों में एंटीबायोटिक के इस्तेमाल से ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन के होने या फैलने का खतरा हो सकता है. ये ड्रग-रेजिस्टेंट इंफेक्शन इंसानों और जानवरों के सीधे संपर्क, फूड प्रोडक्ट और पर्यावरण से फैल सकते हैं.
ज्योति जोशी, साउथ एशिया हेड, CDDEP

सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (CSE) में फूड एवं टॉक्सिन कार्यक्रम के निदेशक अमित खुराना ने इससे पहले फिट से हुई बातचीत में कहा था, "एंटीबायोटिक दवाओं के बढ़ते भार के संपर्क में आने वाले सूक्ष्मजीव इसके प्रति प्रतिरोध विकसित कर सकते हैं. ये प्रतिरोध दूसरे सूक्ष्मजीवों में भी फैल सकता है और ये किसी भी रास्ते इंसानों में प्रवेश कर सकते हैं."

इस तरह जब इंसान या जानवर इन रेजिस्टेंट सूक्ष्मजीवों से संक्रमित होते हैं, तो इलाज मुश्किल और महंगा हो जाता है.

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