COVID-19: वैक्‍सीन तैयार होने के बाद सबसे पहले किसे मिलेगी? 

कोरोना वायरस की कुछ वैक्सीन का ट्रायल अंतिम स्टेज में है

Published31 Jul 2020, 01:30 PM IST
फिट हिंदी
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कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, पूरी दुनिया में अलग-अलग वैक्सीन के 8 बिलियन डोज सालाना तैयार किए जाते हैं. रिपोर्ट ये भी कहते हैं कि, भारत की मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता 3 बिलियन है. इनमें बचपन में लगाए जाने वाले वैक्सीन से लेकर सीजनल फ्लू तक के वैक्सीन शामिल हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक 2010 से 2015 के बीच करीब 1 करोड़ लोगों की जान बचाने वाले इन सभी वैक्सीन की मैन्यूफैक्चरिंग नोवेल कोरोना वायरस के लिए वैक्सीन तैयार करने के लिए नहीं रोकी जा सकती. तो ऐसे में कोरोना वायरस वैक्सीन, कब तक तैयार हो सकती है, और ये दुनिया तक कैसे पहुंचेगी? दुनिया में सभी को ये मिल सके, इसके लिए कितने डोज का उत्पादन करना होगा? आपको और हमें वो कब तक मिल सकेगा? क्या हमें ये मिल सकेगा?

वैक्सीन तैयार करने के मामले में इस वक्त दुनिया कहां खड़ी है?

ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका ने संकेत दिया है कि उनका वैक्सीन कैंडिडेट ChAdOx1 साल के अंत तक तैयार हो सकता है. फाइजर और उसके जर्मन पार्टनर बायोएनटेक ने भी कहा है कि वे अक्टूबर की शुरुआत में मंजूरी के लिए अमेरिक ड्रग रेगुलेटर से संपर्क कर सकते हैं, और वे साल के अंत तक 10 करोड़ डोज और 2021 तक 1 अरब डोज तैयार करने की स्थिति में होंगे.

यूएस-आधारित मॉडर्ना और यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की वैक्सीन mRNA-1273 भी ट्रायल के तीसरे फेज में है और अधिकारियों ने कहा है कि वैक्सीन साल के अंत तक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होगी. WHO के आंकड़ों के मुताबिक, फिलहाल 6 कैंडिडेट क्लीनिकल ट्रायल के फेज 3 में हैं, जिनमें चीन के सिनोवैक, बीजिंग इंस्टिट्यूट और वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल प्रोडक्ट के 3 वैक्सीन कैंडिडेट शामिल हैं.

गौर करें, अभी तक किसी वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल का फेज 3 खत्म नहीं हुआ है और सेफ्टी सुनिश्चित नहीं हुई है साथ ही लाइसेंस नहीं मिला है.

अरबों डोज, लेकिन ये वैक्सीन किसे मिलेंगे?

अभी तक वैक्सीन को लेकर कई जानकारियां जैसे इनकी कीमत क्या होगी, ये कैसे अलग-अलग देशों में पहुंचेगा, आनी बाकी है.
अभी तक वैक्सीन को लेकर कई जानकारियां जैसे इनकी कीमत क्या होगी, ये कैसे अलग-अलग देशों में पहुंचेगा, आनी बाकी है.
(फोटो: iStock)

भूगोल, पैसों, सरकारों की क्षमता पर निर्भर करता है कि वे मैन्यूफैक्चरर्स के साथ डील करें. कई देशों ने पहले से ही वैक्सीन मैन्यूफैक्चरर्स के साथ डील कर ली है ताकि पहला डोज तैयार होते ही वो सबसे पहले उन्हें सप्लाई की जाए.

ब्रिटेन और अमेरिकी सरकार ने ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका के साथ डील कर ली है. ट्रायल के लिए ज्यादातर फंडिंग यूके सरकार से हुई और फार्मा प्रमुख ने कहा है कि ब्रिटेन के लिए 3 करोड़ डोज सितंबर से उपलब्ध होंगे. बाकी डोज अन्य देशों और वैश्विक गठबंधनों जैसे इंक्लूसिव वैक्सीन अलायंस के सदस्य फ्रांस, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड को मिलेगा. अमेरिका ने कहा है कि वो इस साल से वैक्सीन को स्टॉक करना शुरू करेगा. एस्ट्राजेनेका ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए वैक्सीन एलायंस के साथ 30 करोड़ डोज के लिए डील पर हस्ताक्षर किए हैं. (आगे इस बारे में और जानकारी दी गई है).

भारत में पुणे के सीरम इंस्टीट्यूट के साथ ऑक्सफोर्ड की डील हुई है. कंपनी ने कहा है कि वैक्सीन की एक अरब डोज तैयार की जाएगी, जिसमें से 40 करोड़ डोज निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए साल के अंत तक उपलब्ध होंगे. सीरम इंस्टीट्यूट ने कहा है कि भारतीयों के लिए एक बड़ा हिस्सा उपलब्ध होगा.

यूके सरकार ने फाइजर के साथ 3 करोड़ डोज के लिए और फ्रांसीसी कंपनी वलेनेवा के साथ 6 करोड़ डोज के लिए डील की है.

अमेरिका ने एस्ट्राजेनेका के साथ 1.95 बिलियन डॉलर की डील की है और ये 30 करोड़ डोज की डील है. इसके साथ ही फाइजर और बायोएनटेक को 10 करोड़ डोज के लिए शुरुआती ऑर्डर दी है. अमेरिका आगे इनसे 50 करोड़ अतिरिक्त डोज ले सकता है.

चीन ने कहा है कि वैक्सीन तक पहली पहुंच उसकी होगी, हालांकि ये वैक्सीन वैश्विक जनता की भलाई के लिए होगी.

वैक्सीन एलायंस बनाम दुनिया के अन्य देश

COVID-19: वैक्‍सीन तैयार होने के बाद सबसे पहले किसे मिलेगी? 
(फोटो: iStock)

गरीब और मध्यम आय वाले देशों के हितों की रक्षा के लिए और 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' पर लगाम लगाने के लिए WHO और CEPI के साथ GAVI नेतृत्व कर रहा है. COVAX समूह इसका वैक्सीन आर्म है जिसकी पहुंच वैक्सीन की 2 अरब डोज तक होगी.

ये कैसे काम करता है?

ये वैश्विक गठबंधन वैक्सीन की उचित और न्यायसंगत पहुंच सुनिश्चित करेगा. इसके विचार के मूल में प्रतिस्पर्धा की जगह अमीर देशों की क्रय शक्ति का इस्तेमाल अधिक डोज के निर्माण में निवेश के तौर पर करना है. इस उद्देश्य के साथ कि कोई भी देश, चाहे जो भी भुगतान करे, उसे वैक्सीन तक समान पहुंच का मौका मिले.

अब तक, 75 देशों ने COVAX सुविधा में रुचि दिखाई है. वे अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य फंड से भुगतान करके अपनी आबादी के लिए वैक्सीन उपलब्ध कराएंगे. उनका समर्थन 90 अन्य देशों को वैक्सीन प्राप्त करने में मदद करेगा. 2021 के अंत तक हर देश को अपनी कमजोर 20% आबादी को कवर करने के लिए वैक्सीन की तय डोज उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया गया है.

ये सुनने में काफी अच्छा लगता है. लेकिन, अब तक, सिर्फ ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका ने औपचारिक रूप से 30 करोड़ खुराक की आपूर्ति करने के लिए अलायंस के साथ समझौता किया है.

इसके साथ ही देशों को वैक्सीन स्टॉक करने से रोकना भी एक चुनौती है (अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों ने पहले ही स्टॉक करने का इरादा जता दिया है). 2009 में H1N1 महामारी के दौरान, ऑस्ट्रेलिया ने वैक्सीन बनाई, लेकिन पहले अपने नागरिकों के लिए वैक्सीन रखने के लिए निर्यात पर रोक लगाई थी.

भारत ने इस अलायंस में शामिल होने में रुचि दिखाई है. मध्यम आय वाले देश के रूप में, इसे अपनी 20% आबादी के लिए डोज प्राप्त होगी.

पहले किन लोगों को मिलेगा?

दुनिया को वैक्सीन की कितनी डोज की जरूरत होगी? हर्ड इम्युनिटी प्राप्त करने के लिए, दुनिया को करीब 4.7 अरब डोज की जरूरत होगी(अगर सीमा 60% है).

स्वास्थ्य कर्मचारियों और अन्य हाई रिस्क ग्रुप को कवर करने के लिए 2 अरब डोज की जरूरत होगी. पहली डोज स्वास्थ्यकर्मियों, बुजुर्गों, अस्पतालों में हाई रिस्क ग्रुप को मिलेंगी.

इसके बाद, इसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों से शुरू करके, अंतिम मील तक, आबादी के बीच वितरित किया जाएगा.

दुनिया भर में वितरण एक बड़ी चुनौती होने जा रही है और इसमें निर्माताओं, वितरण कंपनियों, देशों और गठबंधनों के बीच असाधारण समन्वय देखने को मिलेगा.

भारत कहां खड़ा है?

भारत के स्वदेशी कोरोना वैक्सीन- कोवैक्सीन का ट्रायल जारी है
भारत के स्वदेशी कोरोना वैक्सीन- कोवैक्सीन का ट्रायल जारी है
(फोटो: फिट हिंदी)
  • कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में हर साल 3 अरब वैक्सीन उत्पादन की क्षमता है.
  • भारत दुनिया में वैक्सीन के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है और यूनिसेफ के वैक्सीन का 70% उत्पादन करता है.
  • भारत की मिनिस्ट्री ऑफ बायोटेक वैक्सीन मैन्यूफैक्चरिंग तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
  • भारत ने GAVI अलायंस में शामिल होने में दिलचस्पी दिखाई है, जो कम से कम 20% आबादी तक वैक्सीन की आपूर्ति सुनिश्चित करेगा.
  • सीरम इंस्टीट्यूट, जिसका ऑक्सफोर्ड के साथ एक करार है, पहले ही कह चुका है कि उनके पास साल के अंत तक वैक्सीन की 40 करोड़ डोज तैयार होंगी और भारत को इसका आधा हिस्सा मिलेगा. वैक्सीन के तीसरे फेज का ट्रायल जल्द ही भारत में शुरू हो जाएगा.
  • सीरम इंस्टीट्यूट भारत (और दुनिया) के सबसे बड़े निर्माताओं में से एक है, इसके बाद बायोलॉजिकल ई, पैनासिया बायोटेक, भारत बायोटेक और शांता बायोटेक हैं.
  • कई अन्य वैक्सीन निर्माताओं ने कई रिसर्च इंस्टिट्यूट के साथ समझौता किया है जिनके वैक्सीन कैंडिडेट ट्रायल के अलग-अलग स्टेज में हैं.
  • मैन्यूफैक्चरिंग में निवेश करने को लेकर कई मुद्दे हैं - अभी, हमें नहीं पता कि वैक्सीन आखिर किस तरह की वैक्सीन काम करेगी - mRNA (मॉडर्न, फाइजर और बायोनेट की तकनीक) एक नई प्रकार की तकनीक है जिसका इस्तेमाल वैक्सीन के उत्पादन में पहले कभी नहीं किया गया है. कई अन्य नई तकनीकों और नवाचारों का इस्तेमाल किया जा रहा है. भारत में कोरोना वैक्सीन की मैन्यूफैक्चरिंग साइट तय कर ली गई हैं.
  • अगर ICMR और भारत बायोटेक का स्वदेशी कोरोना वैक्सीन - कोवैक्सिन - सकारात्मक परिणाम दिखाता है, तो भारत के लिए फायदेमंद होगा. कोवैक्सिन एक इनएक्टिव वैक्सीन है, और दशकों से इस तरह की वैक्सीन भारी संख्या में तैयार की जा रही है.

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