भारत की पहली स्वदेशी कोविड वैक्सीन 'कोवैक्सीन' से फेज 1 ट्रायल में सहन करने योग्य सुरक्षा परिणाम और इम्यून रिस्पॉन्स में बढ़ोतरी देखी गई है. 21 जनवरी को लैंसेट में छपी एक अंतरिम रिपोर्ट में इस बारे में बताया गया है.
डबल-ब्लाइंड रैंडमाइज्ड कंट्रोल स्टडी में पूरे भारत के 11 अस्पतालों में वैक्सीन की सेफ्टी और प्रतिरक्षण क्षमता (इम्यूनोजेनिसिटी) का आकलन किया गया है. 18-55 वर्ष की आयु के 375 स्वस्थ वयस्क इस स्टडी में इनरोल किए गए थे.
ट्रायल के ये नतीजे भारत में 16 जनवरी से शुरू हुए टीकाकरण अभियान के लिए महत्वपूर्ण हैं, जब वैक्सीन खासकर कोवैक्सीन के लिए लोगों में दुविधा देखी जा रही है क्योंकि बड़े ग्रुप में इसके तीसरे फेज का ट्रायल अभी जारी है.
फेज 1 की पीयर रिव्यूड स्टडी के मुताबिक वैक्सीन से बाइंडिंग और न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडी रिस्पॉन्स पाया गया, जैसा कि दूसरे इनएक्टिवेटेड वैक्सीन कैंडिडेट से देखा जाता है.
सबसे आम प्रतिकूल घटना इंजेक्शन की जगह पर दर्द था, जिसके बाद सिरदर्द, थकान और बुखार था. ये सभी रिएक्शन हल्के या मॉडरेट थे. एकमात्र गंभीर प्रतिकूल घटना वायरल न्यूमोनिटिस की रिपोर्ट की गई, जो कि वैक्सीन से जुड़ी नहीं थी.
महत्वपूर्ण बात ये है कि ये अंतरिम परिणाम हैं, जो दीर्घकालिक सुरक्षा परिणामों या एंटीबॉडी प्रतिक्रियाओं का संकेत नहीं देते हैं. इनसे वैक्सीन की एफिकेसी यानी प्रभावकारिता का पता नहीं चलता है.
'कोवैक्सीन' को भारत बायोटेक ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी, पुणे और इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के साथ मिलकर विकसित किया है.
इमरजेंसी यूज ऑथराइजेशन के तहत ट्रायल मोड में इस वैक्सीन को मिली मंजूरी पर विवाद भी हुआ है. कोवैक्सीन के तीसरे फेज का ट्रायल अभी जारी है और एफिकेसी डेटा उपलब्ध नहीं हैं.
कोवैक्सीन इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है. इनएक्टिवेटेड वैक्सीन तैयार करने के लिए बीमारी करने वाले वायरस या बैक्टीरिया को केमिकल या फिजिकल प्रोसेस से इनएक्टिव (मारा) किया जाता है.
इनएक्टिव किए जाने से उस पैथोजन यानी रोगाणु (वायरस या बैक्टीरिया) की अपनी संख्या बढ़ाने की क्षमता खत्म हो जाती है, यानी वो बीमार नहीं कर सकता लेकिन पैथोजन बरकरार रहता है ताकि इम्यून सिस्टम उसकी पहचान कर सके.
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