माइल्ड कोविड में नहीं करना चाहिए स्टेरॉयड का इस्तेमाल: डॉ गुलेरिया

जानिए स्टेरॉयड, सीटी स्कैन, बायोमार्कर्स के इस्तेमाल पर एम्स के डायरेक्टर ने क्या सलाह दी है

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<div class="paragraphs"><p>जानिए स्टेरॉयड, सीटी स्कैन, बायोमार्कर्स के इस्तेमाल पर एम्स के डायरेक्टर ने क्या सलाह  दी है</p></div>
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एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने 3 मई, 2021 को प्रेस ब्रीफिंग में कोरोना के माइल्ड, मॉडरेट और सीवियर मामलों में क्लीनिकल मैनेजमेंट के बारे में बताया.

डॉ. गुलेरिया ने कहा कि माइल्ड कोविड में ज्यादातर लोगों को कोई दवाई की जरूरत नहीं है, अगर कोई दवाई लेना चाहे तो कुछ सीमित आंकड़ों और सीमित निश्चित्ता के आधार पर आइवरमेक्टिन या हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन ले सकते हैं, लेकिन माइल्ड मामलों में ज्यादा दवाई लेने की जरूरत नहीं है.

उन्होंने इस बात पर जोर दिया है कि आइवरमेक्टिन या हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को लेकर बेहद सीमित आंकड़े ही हैं.

'माइल्ड कोविड में स्टेरॉयड की जरूरत नहीं'

डॉ गुलेरिया के मुताबिक स्टेरॉयड मॉडरेट बीमारी के लिए ही है, माइल्ड बीमारी में जब आप होम आइसोलेशन में हैं, ऑक्सीजन सैचुरेशन मेंटेन है, तो शुरू के पांच दिन में स्टेरॉयड का कोई रोल नहीं है, इससे नुकसान भी हो सकता है.

हम देखते हैं कि कई पेशेंट ऐसे हैं, जो शुरुआती स्टेज में स्टेरॉयड ले लेते हैं. ये समझना जरूरी है कि जो शुरुआती स्टेज में स्टेरॉयड लोगे तो वायरस के रिप्लिकेशन को और बढ़ावा मिलेगा.
डॉ. रणदीप गुलेरिया

'सीटी स्कैन का दुरुपयोग न करें'

डॉ रणदीप गुलेरिया ने बताया कि सीटी स्कैन और बायोमार्कर्स का बहुत दुरुपयोग हो रहा है.

सीटी स्कैन आजकल बहुत ज्यादा लोग करा रहे हैं और ये सोचते हैं कि जब भी उनकी कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट आई, तो एकदम सीटी करा लें. शुरू में सीटी कराने का कोई फायदा नहीं है.
डॉ. गुलेरिया

उन्होंने बताया कि अगर माइल्ड कोविड है, तो सीटी से कोई फायदा नहीं है, सीटी में कुछ पैचेस आएंगे.

कई स्टडीज हुई हैं, एक स्टडी में बिना लक्षण वालों का सीटी देखा और ये पाया कि 30-40% बिना लक्षण वाले लोगों के सीटी में भी कुछ पैचेस आते हैं और वो अपने आप बिना ट्रीटमेंट के खत्म हो जाते हैं.

इसलिए सीटी कराने का फायदा नहीं है, खासकर अगर आपको माइल्ड बीमारी है, आप होम आइसोलेशन में हो और आपकी ऑक्सीजन सैचुरेशन ठीक है.

इसका नुकसान समझने की जरूरत है. अगर हम एक सीटी कराते हैं, तो ये 300-400 एक्स रे के बराबर है.

डॉ गुलेरिया के मुताबिक इस तरह बिना जरूरत सीटी कराके लोग अपना रेडिएशन एक्सपोजर ज्यादा कर रहे हैं.

डॉ गुलेरिया ने बताया कि सीटी तभी कराने की जरूरत पड़ती है, जब आपको मॉडरेट कोविड है और हॉस्पिटल में एडमिट हो रहे हैं. अगर शंका हो, तो पहले सीने का एक्स-रे कराना चाहिए, उसके बाद ही सीटी कराएं.

बायोमार्कर्स के बारे में डॉ. रणदीप गुलेरिया कहते हैं कि आजकल लोग कोविड पॉजिटिव होने पर कई ब्लड टेस्ट करा लेते हैं, अपना CRP देख लेते हैं, CBC देख लेते हैं, D-Dimer देख लेते हैं, इनकी जरूरत नहीं है.

इससे पैनिक रिएक्शन ही होगा, ये सारे बायोमार्कर्स एक्यूट फेज रिएक्टेंट हैं मतलब आपकी बॉडी में अगर कभी भी इन्फ्लेमेशन होगी, तो ये बढ़ेंगे. अगर आपको कोई जख्म हुआ, दांत में इन्फेक्शन हुआ तो भी ये बायोमार्कर्स बढ़ेंगे क्योंकि शरीर का इन्फ्लेमेटरी रिस्पॉन्स है.
डॉ. गुलेरिया

इससे ये पता नहीं चलता कि आपकी बीमारी बढ़ गई है. अगर आपको ये कराना है, तो मॉडरेड बीमारी में डॉक्टर की सलाह से ही कराएं.

होम आइसोलेशन में इन चीजों पर गौर करें

घर पर यानी होम आइसोलेशन वाले लोगों के लिए कुछ चीजें बहुत अहम हैं.

  • अपने डॉक्टर से संपर्क करते रहें

  • चेतावनी संकेत जैसे- ऑक्सीजन सैचुरेशन कम होना (93 या 93 से कम हो रही है)

  • सुस्ती ज्यादा हो रही है

  • छाती में दर्द बहुत हो रहा है

तब आप डॉक्टर के पास जाने की जरूरत होगी.

जो लोग हाई रिस्क ग्रुप में हैं और होम आइसोलेशन में हैं, उनको ज्यादा ध्यान रखना है, जिनकी उम्र ज्यादा है, जिनको हार्ट की समस्या है, डायबिटीज है, इम्यूनोसप्रेसिव दवाइयों पर हैं, क्रोनिक लंग प्रॉब्लम है या लिवर की प्रॉब्लम है या क्रोनिक किडनी डिजीज है. इन लोगों को ज्यादा ध्यान रखना चाहिए और रेगुलर तौर पर हेल्थकेयर वर्कर्स के संपर्क में रहना चाहिए.

मॉडरेट और सीवियर कोविड में इलाज

डॉ गुलेरिया के मुताबिक मॉडरेट कोविड में मुख्य रूप से तीन तरह की ट्रीटमेंट प्रभावी है.

  • सबसे पहली ट्रीटमेंट ऑक्सीजन थेरेपी है, ऑक्सीजन भी एक ड्रग है, जब सैचुरेशन कम है, तो ये एक ट्रीटमेंट है.

  • मॉडरेट बीमारी में जब सैचुरेशन कम हो रही हो, तब स्टेरॉयड का रोल है.

  • तीसरी जो दवा है, एंटीकोऑग्लेंट.

कोविड-19 में कुछ चीजें और वायरल निमोनिया से अलग हैं कि ये ब्लड में क्लॉटिंग को प्रमोट करती हैं और उसके कारण फेफड़े में जो रक्त वाहिकाएं हैं, उनमें क्लॉट्स बन जाते हैं, जिसके कारण सैचुरेशन कम हो जाता है. कई दफा क्लॉट्स हार्ट में चले जाते हैं, जिससे हार्ट अटैक हो सकता है या ब्रेन में चले जाते हैं, जिससे स्ट्रोक हो सकता है. इसलिए मॉडरेट केसेज में हम एंटीकोऑग्लेंट भी देते हैं, जिससे खून पतला रहे और क्लॉटिंग न हो.

डॉ गुलेरिया ने इस बात पर जोर दिया कि दवाइयों की टाइमिंग बहुत जरूरी है.

इमरजेंसी यूज ऑथराइजेशन के तहत Remdesivir, Tocilizumab और Convalescent plasma आता है. ये सिर्फ तभी दी जाती हैं, जब लगे कि मरीज की हालत ज्यादा खराब हो रही है. इनमें इतना स्ट्रॉन्ग डेटा नहीं है.

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