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COVID-19 मरीजों के लिए बेड नहीं, दवाई नहीं; ये नौबत कैसे आ गई?

एक्सपर्ट्स क्यों कह रहे हैं कि स्थित बेहतर होने से पहले बदतर होगी

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COVID-19 मरीजों के लिए बेड नहीं, दवाई नहीं; ये नौबत कैसे आ गई?
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कोरोना महामारी में बेड, ऑक्सीजन सप्लाई, दवाइयों, वेंटिलेटर, वैक्सीन की कमी और यहां तक कि RT-PCR टेस्ट न हो पाने जैसी खबरें देश के कई हिस्सों से आ रही हैं. ऐसे में सभी के मन में ये सवाल है कि क्या कोरोना की दूसरी लहर इतनी भयानक है या कोरोना से निपटने में हमारी प्लानिंग बेकार रही है. या कोरोना की लहर और हमारी प्लानिंग दोनों ही इस हद तक बुरी रही हैं?

इस सिलसिले में फिट ने मुंबई के इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ स्वप्निल पारिख और दिल्ली के होली फैमिली हॉस्पिटल में क्रिटिकल केयर मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ सुमित रे से बात की.

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'शॉर्टेज को लेकर हमारा सवाल ही गलत है'

बेड की संख्या और सप्लाई के बजाए असल मुद्दा कोरोना के इस कदर बढ़ते मामले हैं. इसका मतलब है कि शॉर्टेज कोरोना मामलों में आई तेजी का नतीजा हैं और डॉ पारिख चेताते हैं कि जब तक हम इस उछाल पर काबू नहीं पाते, तब तक शॉर्टेज की समस्या बदतर ही होगी.

16 अप्रैल की सुबह केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक दिन में 2 लाख से ज्यादा कोरोना के नए मामलों की सूचना दी और देश में कोरोना के कुल एक्टिव मामले 15 लाख पार हो गए.

हमने बेड, PPE वगैरह की सप्लाई पहले से ही बढ़ा रखी है. हमने तैयारी की, लेकिन इसकी भी एक सीमा है और सिस्टम पर बोझ काफी बढ़ गया है.
डॉ स्वप्निल पारिख, इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट, मुंबई

साल 2020 से हमने काफी कुछ सीखा और अब ज्यादा जानकारी है, वैक्सीन है, चिकित्सा व्यवस्था है, जल्दी रिजल्ट देने वाले टेस्ट हैं, लेकिन फिर भी कोरोना के रिकॉर्ड तोड़ मामलों के सामने सारी तैयारियां छोटी पड़ गईं.

हां, हम कमी को लेकर चिंतित हैं लेकिन हॉस्पिटल सिस्टम- जिसमें डॉक्टर, नर्स जैसे मानव संसाधन शामिल हैं; वॉर्ड, बेड, वेंटिलेटर - सभी की एक सीमा है. डॉ. पारिख का कहना है कि मेडिकल प्रोफेशनल्स जो कर सकते हैं, वो कर रहे हैं, हम उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते हैं.

वो कहते हैं कि हमें तेजी से बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने की जरूरत है, इस पर फोकस करना चाहिए ताकि हॉस्पिटल और फ्रंटलाइन वर्कर्स पर बढ़ते बोझ को घटाने में मदद मिल सके.

“यह वही महामारी है, जिसके बारे में हमें चेतावनी दी गई थी. 2020 एक शुरुआत थी, अब जो आ रहा है, वह और भी बुरा है.”
डॉ स्वप्निल पारिख, इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट, मुंबई

वह कहते हैं, ''इस उछाल की भविष्यवाणी की गई थी और चेतावनी के शुरुआती संकेत थे. इसकी चेतावनी देने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपेक्षा नेतृत्व की एक भयावह विफलता है.”

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हम यहां तक पहुंचे कैसे?

COVID-19 मरीजों के लिए बेड नहीं, दवाई नहीं; ये नौबत कैसे आ गई?
(फोटो: iStock)

इसकी पांच बड़ी वजहें हैं:

  1. डॉ. पारिख कहते हैं, “सभी को लग रहा था कि महामारी खत्म हो गई है. यह एक गलत धारणा थी और कई सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेताया भी, लेकिन उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया गया. देश में हर्ड इम्यूनिटी या भारतीयों की इम्यूनिटी बेहतर होती है जैसी धारणाएं बन रही थीं."

  2. डॉ. पारिख कहते हैं, ''कुछ सबूत हैं कि हम ज्यादा संचरण वाले वैरिएंट्स से जूझ रहे हैं." इससे पहले फिट के एक लेख में, महाराष्ट, वर्धा में कस्तूरबा अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एसपी कलंत्री ने कहा था, "वायरस पिछली बार की तुलना में अधिक संक्रामक है," और डॉ. सुमित रे ने भी इसी तरह कोरोना के नए मामलों में बहुत अधिक उछाल के बारे में बताया था, "शायद नए म्यूटेशन और युवाओं के घूमने के कारण.”

  3. डॉ. पारिख का कहना है कि दुनिया की कोई हेल्थकेयर सिस्टम इतनी ज्यादा तेजी का मुकाबला नहीं कर सकती है. हॉस्पिटलों में इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने की बात पर उन्होंने कहा कि हम समस्या को गलत नजरिए से देख रहे हैं. "हमारे सिस्टम चरमरा रहे हैं क्योंकि बोझ काफी बढ़ गया है, कोई भी इस तरह के उछाल से नहीं निपट सकता है."

  4. राजनीतिक नेतृत्व की भारी विफलता रही है. डॉ. पारिख का कहना है कि बड़े पैमाने पर भीड़ और नेताओं ने बिना मास्क वाली भीड़ देखी है. इससे जनता का रवैया भी ढीला हो जाता है. डॉ. रे कहते हैं, “उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों से मौतों और मामले की संख्या पर पारदर्शिता की कमी है,” ये भी जनता की धारणा को प्रभावित करती है. जैसे कि वायरोलॉजिस्ट डॉ. जमील ने पहले कहा था, "हम चुनावी राज्यों से संख्या में भारी वृद्धि की भविष्यवाणी कर सकते हैं."

  5. डॉ. रे कहते हैं, "कुछ दिनों पहले तक कोई प्रतिबंध नहीं था, इसलिए, निश्चित रूप से, हेल्थकेयर सिस्टम पर बोझ बढ़ना ही था."

"हम उम्मीद करते हैं कि लोग कोविड प्रोटोकॉल का पालन करें, लेकिन हम अपने नेताओं की ओर से कोविड के अनुरूप बर्ताव को नहीं देखते हैं."
डॉ स्वप्निल पारिख, इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट, मुंबई

अगर हमारे नेता बिना मास्क के घूमेंगे, तो पब्लिक को दोष देना बेकार है.

"कई नेताओं का मानना है कि उन्हें वैक्सीन लग चुकी है या वो कोविड से उबर चुके हैं और सार्वजनिक रूप से बिना मास्क या बिना दूरी बनाए लोगों से मिल रहे हैं."
डॉ सुमित रे, हेड, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, होली फैमिली हॉस्पिटल, दिल्ली

'हालात बेहतर होने से पहले बदतर होंगे'

जैसा कि राज्यों ने रात के कर्फ्यू और प्रतिबंधों को लागू करना शुरू कर दिया है, क्या इससे मदद मिलेकी?

“चिंताजनक बात यह है कि अगर कल आगे कोई और संक्रमण नहीं होता है, तो भी आज संक्रमण की रिकॉर्ड संख्या अस्पताल में भर्ती होने होने वाले हैं और यहां तक कि मौतें भी हो सकती हैं. हम जो मौजूदा जूझते अस्पताल और मौतें देख रहे हैं, वे देखे गए शुरुआती वृद्धि का परिणाम हैं.”
डॉ स्वप्निल पारिख, इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट, मुंबई
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लॉकडाउन होना चाहिए या नहीं?

सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि वृद्धि को रोकने के लिए प्रतिबंधों की तत्काल आवश्यकता है.

डॉ. पारिख कहते हैं, "देर से बंद करना जल्दी बंद करने से भी बदतर है, और इसका ये भी मतलब है कि हम स्थिति को भयावह होने दे रहे हैं, दूसरी रणनीतियों का अब वो प्रभाव नहीं है, जो पहले था. हम जितना देर करेंगे आर्थिक गिरावट उतनी ही ज्यादा होगी."

हालांकि, डॉ. रे को लगता है कि एक वर्गीकृत प्रतिक्रिया अभी बेहतर है, जहां हम अपनी पिछली गलतियों से सीख सकते हैं और सामाजिक-आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की भी रक्षा कर सकते हैं.

पिछले साल के लॉकडाउन की आलोचना की गई थी कि इसे जल्दी लागू किया गया, लेकिन मामलों अब जो तेजी देखी जा रही है, उससे तुलना करने पर हम देख सकते हैं कि लॉकडाउन ने इसे रोकने में कितनी मदद की.
डॉ स्वप्निल पारिख, इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट, मुंबई

कडे़ प्रतिबंध कर्व को फ्लैट करने और हेल्थकेयर सिस्टम के बोझ को कम करने में मदद कर सकते हैं. डॉ पारिख चेताते हैं, "सिर्फ डॉक्टर, नर्स और वॉर्ड ब्वॉय ही नहीं हम सभी के लिए मुश्किल है, हमें इस लहर को रोकना ही होगा ताकि हेल्थकेयर सिस्टम इससे निपट सके."

बेड, ऑक्सीजन, दवाइयों की कमी: क्या हेल्थकेयर सिस्टम हार चुके हैं?

COVID-19 मरीजों के लिए बेड नहीं, दवाई नहीं; ये नौबत कैसे आ गई?
(फोटो: iStock)
  • बेड

सभी अस्पताल जूझ रहे हैं. उनके पास बेड नहीं हैं. हमें फिर मरीजों को लौटाना पड़ रहा है.
डॉ हर्षिल शाह, रेजिडेंट डॉक्टर, डिपार्टमेंट ऑफ ऑर्थोपेडिक्स, रुस्तम नर्सी कूपर हॉस्पिटल

डॉ रे कहते हैं कि 100 प्रतिशत कोविड अस्पताल भी इसका समाधान नहीं हैं.

"10 प्रतिशत बेड ट्रॉमा और इमरजेंसी सर्विसेज के लिए रिजर्व करने की जरूरत होती है. लेकिन हमारे दिल्ली के हॉस्पिटल में कोई भी एक रूम नहीं बचा है. फिलहाल के लिए बड़े अस्पतालों में हम मैनेज कर रहे हैं, लेकिन मामलों में तेजी सिस्टम को गिरा सकती है."

“2020 में, लॉकडाउन के साथ, उछाल धीमा था और हम क्षमता बढ़ा सकते थे. अब लोगों के घूमने-फिरने और सामूहिक समारोहों - शादियों, कुंभ मेला आदि के साथ-साथ, अस्पतालों को तुरंत COVID अस्पतालों में बदलना मुश्किल है.”
डॉ सुमित रे, हेड, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, होली फैमिली हॉस्पिटल, दिल्ली
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अस्पतालों में पहले से मौजूद रोगी भी हैं, इसलिए सभी बेड को कोविड वॉर्ड में शिफ्ट नहीं किया जा सकता है.

डॉ. रे यह भी कहते हैं कि यह सिर्फ बेड के बारे में नहीं है, "हमें होटलों से ऑफर मिले, लेकिन यह मददगार नहीं है क्योंकि हमें पूरे सिस्टम की जरूरत है - अस्पताल में बेड, नर्स आदि."

डॉ. रे कहते हैं कि तमिलनाडु और केरल जैसे कुछ राज्यों में अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां हैं - न केवल सुविधाएं बल्कि मजबूत सिस्टम और प्रोटोकॉल भी. "मैं बेड की व्यवस्था करने की कोशिश में नॉन-स्टॉप फोन पर रहा हूं."

  • ऑक्सीजन

मुंबई के एक सरकारी अस्पताल के एक सूत्र ने बताया कि ऑक्सीजन की कमी के चलते एक मरीज की मौत हो गई, “वेंटिलेटर तो भूल ही जाएं, यहां तक कि ऑक्सीजन पोर्ट भी सारे इस्तेमाल हो रहे हैं.”

बुधवार, 14 अप्रैल को, केंद्र ने कहा कि "भारत की दैनिक उत्पादन क्षमता (7287 मीट्रिक टन) और स्टॉक (~ 50,000 मीट्रिक टन) वर्तमान में दैनिक खपत (3842 मीट्रिक टन) से अधिक है." लेकिन सोशल मीडिया या फ्रंटलाइनरों के साथ बातचीत एक अलग तस्वीर पेश करती है.

  • दवाइयां

डॉ हर्षिल ने बताया कि उनके वॉर्ड में दवाइयां लगभग खत्म हो चुकी हैं. रेमडेसिविर पर क्या स्थिति रही है, वो बीते कुछ दिनों में सामने आया है.

  • टेस्ट और टेस्टिंग सेंटर

टेस्ट न होना, टेस्टिंग में देरी और टेस्टिंग सेंटर बंद होने की रिपोर्ट लगभग सभी राज्यों से आ रही हैं. जो रिजल्ट 24 घंटों में आते थे, अब उनमें हफ्ते भर का समय लग रहा है और कभी-कभी उससे भी ज्यादा समय लग रहा.

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हम क्या कर सकते हैं?

  • नॉन-मेडिकल इंटरवेंशन

हम घर के अंदर रह कर, मास्क लगाकर ट्रैजेक्टरी को चेंज कर सकते हैं.

अगर सभाएं हों - राजनीतिक, धार्मिक शादियां - तो टेस्ट कराने की जरूरत है.

डॉ पारिख कहते हैं कि जब टेस्टिंग के दौरान भीड़ होती है, तब भी ट्रांसमिशन का रिस्क होगा. हमें सभी तरह भीड़ को रोकने की जरूरत है. हमें टेस्टिंग बढ़ाने की भी जरूरत है. RT-PCR और एंटीजन टेस्ट के अलावा भी विकल्प हैं, जिनका हमें फायदा उठाना चाहिए.

2020 से सबक लें

डॉ. रे कहते हैं कि हम पिछले महामारियों से सीख सकते हैं और भविष्यवाणी कर सकते हैं कि यह छोटे क्षेत्रों में शिफ्ट होगा, “हम पहले से ही टियर 2 और 3 शहरों को प्रभावित होते हुए देख रहे हैं. उनके पास बुनियादी ढांचा नहीं है और इससे मृत्यु दर बढ़ती है."

वह कहते हैं कि हमें केरल से सबक लेने की जरूरत है. केरल की स्वास्थ्य मंत्री के.के शैलजा ने NDTV से कहा, "संख्या अधिक रहेगी लेकिन हमें रणनीतिक नियंत्रण की आवश्यकता है." इसका मतलब है कि कुछ समय के लिए, स्पाइक्स या लहरें होंगी, लेकिन बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी नहीं होगी.

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“राज्य सरकारों को अस्पताल प्रणालियों को कारगर बनाने के लिए फिर से आगे आने की जरूरत है. पिछली बार, हमें स्पष्ट था कि गंभीर रोगियों कहां रखना है, कम गंभीर बीमरी में कहां रखना है. इससे लोगों में घबराहट को भी कम करने में मदद मिलती है क्योंकि अभी लोग बड़े अस्पतालों में सिर्फ भाग-दौड़ रहे हैं."
डॉ सुमित रे, हेड, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, होली फैमिली हॉस्पिटल, दिल्ली

बेड की कमी उन लोगों के कारण भी है, जो यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अगर उनकी स्थिति बिगड़ती है तो वे वेंटिलेटर और दवाओं तक पहुंच सकें. डॉ रे कहते हैं, "तो अगर तृतीयक और प्राथमिक अस्पतालों के बीच समन्वय बढ़ता है, तो इन मामलों को संभाला जा सकता है."

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