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मेंटल हेल्थ पर बातचीत कीजिए, लेकिन इन मिथ से बचिए

'मानसिक बीमारी वास्तविक है, ये एक मेडिकल समस्या है'

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वीडियो एडिटर: कुनाल मेहरा

(अगर आपको खुदकुशी जैसे ख्याल आ रहे हों या आप किसी को जानते हों जो इससे परेशान हो, तो कृपया उनसे नरमी के साथ बात करें और स्थानीय आपातकालीन सेवाओं, हेल्पलाइन और मेंटल हेल्थ एनजीओ के इन नंबरों पर कॉल करें.)

दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत और मीडिया कवरेज ने एक बदसूरत मोड़ ले लिया. इससे पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक बीमारी को लेकर हमारी समझ कितनी खराब है.

मेंटल हेल्थ कोई सनक नहीं है. मानसिक बीमारी वास्तविक है, ये एक मेडिकल समस्या है, ठीक वैसे ही जैसे कि डायबिटीज या अस्थमा. बढ़ती चर्चा के बीच जरूरी है कि मानसिक स्वास्थ्य और बीमारियों के लेकर गलत धारणाओं को खत्म करने की कोशिश की जाए.

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मिथ 1: ‘मानसिक बीमारी वास्तविक नहीं है’

अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ साइकिएट्री के मुताबिक मानसिक बीमारियां हेल्थ कंडीशन है जिसमें भावनाओं, बातचीत, व्यवहार में बदलाव दिख सकता है या एक साथ तीनों में बदलाव दिख सकता है. WHO इसे एबनॉर्मल सोच, भावनाओं, व्यवहार का कॉम्बिनेशन बताता है.

लोग अलग-अलग तरह की थेरेपी और दवाइयों, या सहकर्मी के सपोर्ट या एक साथ इन सब के जरिये अपनी मानसिक बीमारियों पर काबू करते हैं. ये वास्तविक है और इसे काबू किया जा सकता है. ये बेहद आम है और इसमें शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है.

डिप्रेशन और बाइपोलर डिसऑर्डर शब्द का इस्तेमाल अपमान या शर्मनाक चीज के तौर पर होते दिखता है. ये उतना ही बेतुका है जितना कि अगर मैं आपको हाई-ब्लड प्रेशर होने पर मजाक बनाने लग जाऊं या आपको दिल का दौरा पड़ने पर मजबूत होने की सलाह देने लग जाऊं!

भारत में इसे लेकर कानून भी है- मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017. इसका उद्देश्य है मानसिक बीमारी वाले व्यक्तियों को मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना. ये सुनिश्चित करता है कि इन व्यक्तियों को गरिमा के साथ भेदभाव या उत्पीड़न के बिना जीवन जीने का अधिकार है.

मिथ नंबर 2: मानसिक बीमारी का कोई चिकित्सा प्रमाण नहीं

मेंटल हेल्थ और बीमारी को इतना स्टिगमटाइज कर दिया गया है कि ये दिखता ही नहीं इसलिए ये मानना आसान हो गया है कि ये एग्जिस्ट ही नहीं करता!

लेकिन हमें अपने आसपास के लोगों को थोड़ा नजदीक से सुनने और उनसे बात करने की जरूरत है ताकि हम देख सकें कि मानसिक बीमारी सच में कितनी कॉमन है. भारत में मेंटल हेल्थ को लेकर स्टिग्मा है जिसकी वजह से मरीजों को मदद लेने में परेशानी होती है.

कई तरह के मेंटल हेल्थ कंडीशन होते हैं जिनमें खाने-पीने के डिसॉर्डर से लेकर डिमेंशिया तक है. ये अलग-अलग लेवल पर देखा जा सकता है. अगर कोई कहता है कि वो इससे जूझ रहा है तो हो सकता है उसे शायद काम करने, घर पर, परिवार में, दोस्तों के बीच दिक्कतें पेश आ रही हों.

हम क्या कर सकते हैं?

हम उन्हें सुन सकते हैं और उनपर भरोसा कर सकते हैं. मानसिक बीमारियों के मनोवैज्ञानिक लक्षण बिल्कुल वास्तविक हैं और ये विनाशकारी हो सकता है.

आत्महत्या की रोकथाम के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है कि हम मानसिक स्वास्थ्य और बीमारियों पर बात करें, बिना किसी जजमेंट या मजाक के. मानसिक बीमारी वाले लोगों की ब्रेन फंक्शनिंग में बदलाव होता है इसके कई प्रमाण हैं, जो बढ़ रहे हैं. ये जानना भी जरूरी है कि मानसिक बीमारी पर रिसर्च हर दिन बढ़ रहा है.

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मिथ नंबर 3: ये धंधा है, फेक है और अटेंशन सीकिंग है!

मानसिक स्वास्थ्य के बारे में ज्यादा बात करनी चाहिए लेकिन हमारी बातचीत में, हमें याद रखना चाहिए कि एक्सपर्ट बनने से पहले कुछ क्वॉलिफिकेशन होनी जरूरी होती है.

एक्सपर्ट जिनमें साइकिएट्रिस्ट, साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर जैसे मेडिकल प्रोफेशनल होते हैं या बाकी एक्सपर्ट जैसे रिसर्चर और साइंटिस्ट.

मिथ नंबर 4: आप बहुत खुश /सफल / पावरफुल/ अमीर हैं...आपको मानसिक बीमारी क्यों होगी?

सिर्फ एक ही ‘डिप्रेस्ड लुक’ नहीं है. ये एक कॉमन मेंटल इलनेस है, जो कई तरह से नजर आता है और लोग इससे अलग-अलग तरीकों से निपटते हैं.

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