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कोविड19 में स्कूल, बंद और खुलने के बीच बच्चों की मानसिक स्तिथि पर क्या असर पड़ा?

कोविड19 के दौरान हर बच्चे की मानसिक स्थिति में अलग-अलग बदलाव देखे गए हैं. चलिए इस विषय पर एक नज़र डालें.

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कोविड19 में स्कूल, बंद और खुलने के बीच बच्चों की मानसिक स्तिथि पर क्या असर पड़ा?
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कोविड19 के कारण बीते 2 वर्षों में पूरी दुनिया रुक-रुक कर चल रही है. इस खुलती बंद होती दुनिया का असर छोटे बच्चों की मानसिक स्तिथि पर बड़े पैमाने पर देखा जा रहा है. बड़ों के साथ छोटे बच्चे कोविड19 की वजह से अपने-अपने घरों में महीनों तक नज़रबंद रहे. कम बोलचाल के साथ-साथ उनके खेलकूद का दायरा भी सिमट चुका था. साथ ही साथ कोविड19 नाम की एक अनजान बीमारी के कारण अपने आसपास और दुनिया में मच रही तबाही को वे देख और समझ रहे थे. जिसकी वजह से अधिकतर बच्चों के अंदर डर ने घर बना लिया. जिसका सीधा असर उनके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर दिखता है.

अभी भी बच्चों की दुनिया पूरी तरह से खुली नहीं है. एक अनिश्चितता अभी भी बनी हुए है. देश के कई हिस्सों में छोटे बच्चों के स्कूल, प्रतिबंधों के साथ धीरे-धीरे खुल रहे हैं, पर अभी भी ऐसे कई शहर हैं, जहां कोविड19 के कारण स्कूल बंद हैं. इस लेख के माध्यम से चलिए विशेषज्ञों से जाने कि कोविड19 में स्कूल बंद और खुलने के बीच बच्चों की मानसिक स्तिथि क्या है?

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<div class="paragraphs"><p>कोविड19 में मानसिक पीड़ा सहते बच्चे&nbsp;</p></div>

कोविड19 में मानसिक पीड़ा सहते बच्चे 

(फ़ोटो:istock)

कोविड19 में बच्चों की मानसिक स्तिथि 

डॉ. दीपक गुप्ता, बाल मनोचिकित्सक, सर गंगा राम हॉस्पिटल ने फ़िट हिंदी को बताया कि "कोविड19 ने छोटे बच्चों को मानसिक तौर पर नुक़सान पहुँचाया है. 21 महीनों का सफ़र, बच्चों ने ज़्यादातर घर की चार दीवारों के अंदर बिताया है. कोविड19 ने बच्चों का रूटीन बिगाड़ दिया. ना तो सोने का कोई निर्धारित समय, ना जागने का. ऑनलाइन स्कूल के लिए घंटों स्क्रीन के सामने बैठे रहना और घर के अंदर ही खेलना, उनके लिए एक बंधन सा बन गया. स्कूल, अध्यापक, दोस्तों- रिश्तेदारों, शारीरिक व्यायाम, दौड़ भाग से अचानक दूर हुए बच्चे अपने अंदर ग़ुस्सा, डर और दुःख महसूस करने लग गए. वैसे हर बच्चा दूसरे से भिन्न होता है, इसलिए हर बच्चे की मानसिक स्थिति में अलग-अलग बदलाव देखे गए."

<div class="paragraphs"><p>कोविड19 के बाद स्कूल के नियमों में बदलाव </p></div>

कोविड19 के बाद स्कूल के नियमों में बदलाव

(फ़ोटो:istock)

कोविड19 में लंबे अंतराल के बाद स्कूल पहुँचे बच्चे

कोविड19 के बीच स्कूल बंद और खुलने से बच्चों की मानसिक स्तिथि का अंदाज़ा लगाने के लिए फ़िट हिंदी ने डॉ. कोमल मनशानी, सलाहकार साइकाइट्री- मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी, साकेत से बातचीत की. उन्होंने बताया कि "वापस जाने को ले कर बच्चों की अलग-अलग सोच है, कुछ बच्चे स्कूल वापस जाने के लिए उत्सुक हैं ताकि वे अपने पुराने दोस्तों से मिल सकें और अपनी पुरानी दैनिक दिनचर्या और गतिविधियों में वापस जा सकें. हालाकि, यह ज्यादातर बड़े बच्चों में देखा गया है. उन्हें कोविड19 से पहले का समय अच्छी तरह याद है और वे यह भी समझते हैं कि वे इतने दिनों से घर के अंदर ही क्यों रह रहे थे."

"मेरे हिसाब से, छोटे बच्चे स्कूल वापस जाने के बारे में अधिक संशय में हैं. उन्हें अब घर में रहने की आदत पड़ गई है, जहां उन्हें सुबह जल्दी उठ कर, तैयार हो कर, लोगों से मिलना और बातचीत करना नहीं पड़ता है. ऐसे बच्चे वापस स्कूल के दिनचर्या में आने को ले कर चिंतित हो लगते हैं."
डॉ. कोमल मनशानी
<div class="paragraphs"><p>बच्चों में कोविड19 के बाद अलगाव का डर&nbsp;</p></div>

बच्चों में कोविड19 के बाद अलगाव का डर 

(फोटो:iStock)
"माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों को आश्वस्त करना होगा कि स्कूल एक सुरक्षित स्थान है, जहां कोविड19 से संबंधित सभी प्रोटोकॉलों का ध्यान रखा जा रहा है. बच्चों को इससे संबंधित बदलावों के लिए भी तैयार कराना होगा. बच्चों को कोविड19 से पहले की उन चीजों के बारे में याद दिलाना होगा जो उन्हें पसंद थीं, जैसे कि दोस्तों से मिलना, उनके साथ खेलना और स्कूल की एक्टिविटियों में भाग लेना."
डॉ.कोमल मनशानी, सलाहकार साइकाइट्री - मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी, साकेत

बच्चों को स्कूल के लिए कैसे तैयार करें?

कोविड19 के कारण लंबे अंतराल के बाद स्कूल वापस पहुँचे बच्चों की मानसिक स्तिथि के बारे में गुरुग्राम की एक स्कूल काउन्सिलर विश्वानी मारिया कपूर ने बताया " स्कूल वापस आने की प्रतिक्रिया ने बच्चों को कई अनोखे तरीकों से प्रभावित किया है। कुछ सामान्य व्यवहार और भावनाएं जिनकी अपेक्षा हम 10 साल से कम उम्र वाले बच्चों से कर सकते हैं, जब वे स्कूल वापस आना शुरू करते हैं:

  • इतने दिनों बाद स्कूल वापस जाने को ले कर बच्चों में झिझक होगी और यह बेहद जरूरी है कि हम उनकी घबराहट या चिंता को स्वीकारें और उन्हें मान्यता दें. बड़ों का उनके साथ खुलकर गैर-निर्णयात्मक रूप से बात करना और उनकी चिंताओं को सुनना और समझना, बच्चों को उनकी घबराहट से उभरने में मदद करेगा.

  • परिवर्तन का प्रतिरोध – नई दिनचर्या का पालन न करना, स्कूल जाने से इंकार करना या उन कार्यों से परहेज करना जो वे पहले करते थे.

  • चिंता और अनिश्चितता दर्शाना – बार-बार पूछना कि आगे क्या होने जा रहा है, माता-पिता से अधिक चिपके रहना, अकारण मांग करना और नींद या भूख के पैटर्न में बदलाव आना.

  • अस्पष्टीकृत भावनाएं - भावनाएं जो संदर्भ से बाहर हैं या जो स्थिति के अनुपात में नहीं हैं, जैसे कि छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन, बिना किसी वास्तविक कारण के गुस्सा, परेशान या कर्कश होना.

  • वहीं कुछ बच्चों में बहुत अधिक उत्साह - साथियों से बार-बार संपर्क करना और स्कूल की योजना बनाना, समय पर ध्यान दिए बिना सिर्फ अपनी पसंदीदा चीजें करना चाहना, दिन के अधिकांश समय हंसना/मजाक करना/चंचल रहना।

  • छोटे बच्चे (2-6 साल की उम्र वाले) कुछ वस्तुओं, खिलौनों या घर के सदस्यों के प्रति बढ़ा हुआ लगाव दिखा सकते हैं. यह आने वाले परिवर्तन की प्रत्याशा में सेपरैशन ऐंगज़ाइटी का एक रूप हो सकता है."

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