क्या मोटापे से कम होने लगती है याददाश्त?

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एक स्टडी में अधिक बीएमआई वाले लोगों के मस्तिष्क की बनावट भी अलग पाई गई

एक अध्ययन में मोटापा, दिमाग की संरचना, मानसिक प्रदर्शन और आनुवंशिकता के बीच संबंध होने की बात कही गई है. इसमें कहा गया है कि हमारी याददाश्त और दिमाग पर अधिक बॉडी मास इंडेक्स (BMI) यानी लंबाई के अनुपात में अधिक वजन का प्रभाव पड़ सकता है.

मॉन्ट्रियल न्यूरोलॉजिकल इंस्टीट्यूट एंड हॉस्पिटल (द न्यूरो) ने 1200 से अधिक लोगों पर ये अध्ययन किया. इसमें इन लोगों की एमआरआई (मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग) और संज्ञानात्मक परीक्षण (कॉग्निटिव टेस्ट) का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि मोटापे का हमारे मस्तिष्क की संरचना और इसके प्रदर्शन से संबंध हो सकता है.

इस विश्लेषण के मुताबिक अधिक BMI वाले लोगों की कॉग्निटिव फ्लेक्सबिलटी, मन पर काबू रखने की क्षमता और याददाश्त में कमी देखी गई.

अधिक बीएमआई वाले लोगों के मस्तिष्क की संरचना भी अलग पाई गई. उनका बायां प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मोटा और दायां प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पतला पाया गया.

अधिक बीएमआई वाले लोगों के मस्तिष्क में बायां प्रमस्तिष्क खंड (amygdala) बड़ा था. दिमाग का ये हिस्सा व्यक्ति के भोजन और खाने की आदतों से जुड़े व्यवहार से संबंधित है. अधिक बीएमआई वाले व्यक्ति के मस्तिष्क के उन हिस्सों में कमी पाई गई, जो सामान्य रूप से घटना विशेष की याददाश्त और संदर्भ से संबंधित हैं.

शोधकर्ताओं के निष्कर्ष में ऐसे लोगों का वजन बढ़ने की ज्यादा संभावना रही, जो खाने को लेकर ज्यादा जागरूक रहे और जो ओवर ईटिंग पर नियंत्रण नहीं कर सके या ये नहीं समझ सके कि इससे उनका वजन बढ़ेगा.

शोधकर्ताओं ने ऐसे लोगों पर भी अध्ययन किया, जो एक दूसरे से संबंधित (जैसे भाई-बहन और जुड़वा) थे. कई सांख्यिकीय विधियों से यह पाया गया कि मोटापे में जेनेटिक्स भी अहम भूमिका निभाती है.

साइंस डेली से बातचीत में इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका उकू वायनिक कहती हैं:

मोटापे से निपटने के लिए ट्रेनिंग, खाने की इच्छा पर काबू पाने की क्षमता में सुधार के साथ न्यूरोबेहेविरियल कारकों के बदलाव में ये रिसर्च मददगार होगी. मोटापे को नियंत्रित करने के लिए सिर्फ आहार पर ही फोकस नहीं करना चाहिए बल्कि न्यूरोबेहेविरियल प्रोफाइल को स्वीकारना होगा क्योंकि मोटापा आनुवांशिकता से भी जुड़ा है. इस तरह आनुवांशिक तौर पर जिन पर मोटा होने का जोखिम है, वो भी बचाव कर सकते हैं.  

उकू वायनिक, यूरोपीय देश एस्टोनिया के यूनिवर्सिटी ऑफ टार्टू में द न्यूरो एंड द इंस्टीट्यूट ऑफ साइकोलॉजी में रिसर्चर हैं.

ये अध्ययन Proceedings of the National Academy of Sciences में प्रकाशित हुआ है.

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