कोरोना वायरस: अब तक COVID-19 के बारे में हम क्या-क्या जान पाए हैं

किस तरह पूरे शरीर पर असर डालता है कोरोना वायरस

Published17 Jul 2020, 11:26 AM IST
सेहतनामा
8 min read

यह जुलाई 2020 है और हम फिलहाल एक वैश्विक महामारी से जूझ रहे हैं. भारत में जनवरी 2020 के अंत में कोरोना वायरस का पहला मामला पाए जाने के छह महीने बाद भी, हम नोवल कोरोना वायरस के बारे में बहुत सी बातें नहीं जानते हैं.

लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो हम जानते हैं.

फिट ने वायरस के विकास के चरणों का अध्ययन किया है - और हमारी समझ का भी जो इन 6 महीनों में बनी है.

COVID-19: एक असामान्य बीमारी

डॉ. सुमित रे जो कि दिल्ली में क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट हैं और एक कोविड ICU के प्रभारी हैं, उनका कहना है कि हालांकि COVID-19 एक गंभीर और अनोखी बीमारी है, लेकिन इसके कई पैटर्न दूसरे वायरल इन्फेक्शन जैसे ही हैं. चूंकि यह एक नया वायरस है, इसके आम लक्षणों में से कुछ तीव्र हैं और डॉक्टर अभी भी लक्षणों और कारणों के बीच की कड़ियों की ज्यादा जानकारी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

शुरुआत में, जब दुनिया इस बीमारी को समझने की कोशिश कर रही थी, हमने इसे शुरुआत में रेस्पिरेटरी डिजीज (सांस की बीमारी) के तौर पर देखा. इसलिए सांस लेने में कठिनाई का अंदाजा लगाया जा रहा था और सबसे पहले फेफड़े खराब होने की आशंका जताई गई थी.

लेकिन COVID-19 में अजीब तरीके से बदलाव देखा गया है, जिससे इंसानी शरीर पर सांस की परंपरागत बीमारियों से अलग असर हो रहा है. जबकि हमने इसे समझना शुरू किया है तो पता चला कि SARS-CoV-2 दिमाग से लिवर तक कई अंगों पर कहर बरपा सकती है. एक और महत्वपूर्ण सीख यह है कि बीमारी की गंभीरता हमेशा विभिन्न लक्षणों की गंभीरता से जुड़ी नहीं होती है, खासकर न्यूरोलॉजिकल मामलों में.

COVID-19 से जुड़े नतीजों को अभी भी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है, लेकिन कुछ अध्ययन हुए हैं जो कुछ COVID-19 रोगियों में किडनी को गंभीर नुकसान की ओर इशारा करते हैं. कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि हार्ट की बीमारियों वाले लोगों के लिए वायरस सबसे बुरा है, और कुछ मामलों में अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीजों का हार्ट फेल भी हो जा रहा है. एक अन्य अध्ययन में कहा गया है, “नोवल कोरोनोवायरस डिजीज 2019 (COVID-19) के मरीजों के लिवर फंक्शन में गड़बड़ी हो जाती है”, लेकिन अभी इसका पता लगाना है कि यह COVID-19 का लक्षण है या इसका कारण दवा-इलाज है या कोई अन्य कारण है.

लेकिन क्रिटिकल केयर मेडिसिन के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सुमित रे बताते हैं कि ये सभी प्रभाव गंभीर वायरल इन्फेक्शन में आम हैं.

“क्या आप जानते हैं कि डेंगू के मरीजों का एक बड़ा हिस्सा लिवर डैमेज से मरता है? वायरल की हर गंभीर बीमारी में लिवर खराब होता है.”
डॉ. सुमित रे, सीनियर कंसल्टेंट, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, होली फैमिली हॉस्पिटल

वह कहते हैं कि 1 जून से 14 जुलाई तक, होली फैमिली हॉस्पिटल, दिल्ली में उनके आईसीयू में 108 COVID-19 मरीजों का इलाज किया गया. “उनमें से ज्यादातर मरीजों के लिवर के एंजाइम बढ़े हुए थे, न कि एक्यूट लिवर डैमेज हुआ था. कई बार इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली रेमडेसेवियर (remdesevir) और टोसीलिज़ुमैब (tocilizumab) जैसी दवाइयां लिवर डैमेज का कारण बनती हैं.”

ब्रेन डैमेज और COVID-19

कोरोना वायरस: अब तक COVID-19 के बारे में हम क्या-क्या जान पाए हैं

कई अध्ययन बताते हैं कि वायरस अक्सर हमारे शरीर में न्यूरोलॉजिकल लक्षण पैदा कर सकता है, जिसे हम एन्सेफैलोपैथी या जनरल ब्रेन डैमेज के तौर पर जानते हैं.

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में पब्लिश ये स्टडी मतिभ्रम (delirium) और भ्रम से लेकर विभिन्न संज्ञानात्मक समस्याओं के बारे में बताती है. अनुमान अलग-अलग हैं, लेकिन दुनिया भर में लगभग 50 प्रतिशत मरीजों ने किसी न किसी तरह की न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का अनुभव किया है.

मुंबई में रहने वाले एक डॉक्टर ने नाम न उजागर करने की शर्त के साथ बताया कि “हमने अपने आईसीयू में भ्रम, भटकाव और मतिभ्रम के कई मामले देखे हैं. ऐसा सांस लेने के दौरान होने वाली सांस की परेशानी के कारण ऑक्सीजन की कमी के कारण भी हो सकता है.”

डॉ रे दोहराते हैं,

“क्रिटिकल केयर एक जटिल प्रक्रिया है. अगर ठीक से संभाला नहीं जाता है, तो किसी भी बीमारी में क्रिटिकल केयर वाले ज्यादातर मरीज मतिभ्रम की दशा में चले जाते हैं. ऐसा आम है.”

ऐसे अध्ययन भी सामने आ रहे हैं जिनमें COVID-19 के नौजवान मरीजों में स्ट्रोक की आशंकाएं जताई गई हैं और डिमेंशिया के बिगड़ने और इसके बीमारों में ऐसे ही दूसरे लक्षण सामने आए हैं.

थॉमस जेफरसन यूनिवर्सिटी के पास्कल जाबोर ने पीटीआई से कहा, “हम 30, 40 और 50 की उम्र वाले मरीजों को गंभीर स्ट्रोक का शिकार होते देख रहे हैं, जो आमतौर पर 70 से 90 की उम्र के मरीजों में देखते थे.” चिंता की बात यह है कि ऐसे स्ट्रोक की आशंका उन COVID पॉजिटिव मरीजों में भी है, जिनमें कोई लक्षण नहीं दिख रहे हैं, लेकिन यह याद रखना जरूरी है कि ये सभी शुरुआती अध्ययन हैं और अंतिम नतीजा निकालने से पहले ज्यादा आंकड़ों की जरूरत होगी. जरूरी सबक यह है कि ये समस्याएं नौजवान मरीजों में बार-बार सामने आ रही हैं.

एक और बड़ी चिंताजनक बात यह है कि कुछ COVID मामले दिमाग में सूजन (जिसे इंसेफलाइटिस कहा जाता है) से जुड़े हैं. एक्यूट डिस्सेमिनेटड एन्सेफैलोमाइलाइटिस (ADEM) में दिमाग में घाव हो जाता है और ऑक्सीजन की भी कमी होती है.

इस वायरस ने दुनिया के सामने कई समस्याएं पैदा कर दी हैं, और चूंकि यह एक नया वायरस है, दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इस पर काबू पाने की कोशिशों में जुटे हैं.

यहां एक समस्या पर्याप्त, भरोसेमंद आंकड़ों की कमी की है और इसका एक बड़ा कारण यह है कि कई देशों (भारत सहित) ने अभी तक पर्याप्त टेस्ट नहीं किया है. बेशक यह कई नीतिगत खामियों, टेस्ट विकसित करने और लागू करने की समस्याओं के कारण है, लेकिन इसका मतलब है कि कई लोग बिना टेस्ट के COVID-19 के लक्षणों का अनुभव कर रहे हैं. फिर हम इन लोगों का क्या करेंगे?

बदलता प्रोफाइल, आयु समूह

कोरोना वायरस: अब तक COVID-19 के बारे में हम क्या-क्या जान पाए हैं

एकदम शुरू में, हमने सोचा था कि यह कोरोनोवायरस की एक ज्यादा आक्रामक किस्म है, फ्लू का एक ज्यादा गंभीर रूप. लेकिन सार्स-कोविड-2 में कई असामान्य बातें हैं - जिसका मतलब है कि हम जिस तरह के मरीजों को देख रहे थे, उसमें भी बदलाव आया है.

शुरू में, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि बुजुर्ग, हृदय रोग, डायबिटीज, पुरानी सांस की बीमारी और कैंसर जैसी कोमार्बिटीज (साथ में कोई अन्य बीमारी) वाले लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है.

और हालांकि, अधिकांश आबादी के लिए, ऐसा सही लगता है, लेकिन ज्यादा से ज्यादा संख्या में नौजवान मरीज संक्रमित हो रहे हैं और नए किस्म के लक्षण दिखा रहे हैं. हमने न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के बारे में बात की थी, लेकिन 10 साल से कम उम्र के मरीजों के दिमाग में सूजन (इनफ्लेमेटरी) की समस्या एक चिंताजनक पहलू है.

पीडियाट्रिक मल्टीसिस्टम इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम नाम की एक बीमारी अमेरिका में न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया और लूसियाना और यूरोप में इटली, फ्रांस और स्विट्जरलैंड में बच्चों में बढ़ रही रही है.

द लांसेट में पब्लिश एक स्टडी इन लक्षणों की तुलना बच्चों में पाई जाने वाली कावासाकी नाम की एक बीमारी से की गई है. “कावासाकी डिजीज शॉक सिंड्रोम (KDSS) में सर्कुलेटरी डिस्फंक्शन (संचलन संबंधी शिथिलता) और मैक्रोफेज एक्टिवेशन सिंड्रोम (MAS) की मौजूदगी जैसा बताया गया है.” इसमें लिखा है, यह अब तक दुर्लभ थी, और जिन बच्चों को यह हुई, वे ठीक हो गए हैं, लेकिन महामारी शुरू होने के बाद से पिछले वर्षों की तुलना में ऐसे मामलों में बढ़ोतरी हुई है.

सूजन के मुद्दे पर, साइटोकिन स्टॉर्म या COVID-19 के लिए हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रणाली की तीव्र प्रतिक्रिया को लेकर काफी चर्चा होती है. जबकि असामान्य रूप से इतनी बड़ी संख्या में, यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया है.

“यह एक नया वायरस है, इसलिए हम यह मान सकते हैं कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली इसे पहचानने और उससे लड़ने में हद से आगे जाएगी.” हम वायरस को नहीं पहचानते हैं, इसके खिलाफ कोई प्रतिरक्षा नहीं है और इसलिए साइटोकाइन स्टॉर्म को एक बायोलॉजिकल प्रतिक्रिया के रूप में समझा जा सकता है.

डॉ. रे कहते हैं, “निश्चित रूप से, हमने ऐसा होने की उम्मीद नहीं की थी और COVID अधिक साइटोकाइन स्टॉर्म का कारण बन रहा है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से हमारा शरीर जब एक नए वायरस का सामना करता है, तो ऐसा होता है.”

डायबिटीज और COVID-19

जैसे-जैसे बीमारी आगे बढ़ रही है, भारत में सबसे आम जोखिम वाले कारकों में से डायबिटीज एक पाया गया है. हमारे देश में डायबिटीज के मरीजों की संख्या बहुत ज्यादा है, लेकिन डॉ. रे ने हमें बताया कि कोविड-19 के अधिकांश गंभीर मरीज डायबिटीज के मरीज या प्री-डायबिटिक थे.

भारत और दूसरे देशों में डायबिटीज के मरीजों को इस बीमारी से ज्यादा खतरा है, साथ ही मोटापा भी खतरा है. मेरे COVID ICU में 80% से ज्यादा मरीज डायबिटिक हैं. उनके इम्यून सिस्टम में क्या खामी है, जिससे उन्हें यह बीमारी हुई? हम इसका पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
डॉ. सुमित रे, सीनियर कंसल्टेंट, क्रिटिकल केयर मेडिसिन, होली फैमिली हॉस्पिटल

डॉ. रंजीत उन्नीकृष्णन जर्नल ऑफ डायबिटोलॉजी में कहते हैं, “डायबिटीज वाले लोगों को आम लोगों के मुकाबले COVID-19 से ज्यादा खतरा नहीं है. हालांकि, अगर उन्हें COVID-19 हो जाता है, तो उन्हें बीमारी के अधिक गंभीर होने या एडवांस स्टेज में जाने का खतरा है. इसलिए, ग्लाइसेमिक कंट्रोल (शरीर में ग्लूकोज की मात्रा का स्तर) बुनियादी जरूरत है. किसी भी संक्रमण से ब्लड शुगर के स्तर में वृद्धि होने की आशंका होती है और अनियंत्रित डायबिटीज आगे चलकर संक्रमण को और गंभीर कर सकता है. ”

ऐसा कहा जा रहा है, जिन मरीजों को पहले से डायबिटीज नहीं है या जिन्हें इस बीमारी का पता नहीं चला है, उन्हें अब हाई ब्लड शुगर हो रहा है. लेकिन फिर से बता दें, यह असामान्य बात नहीं है.

“किसी भी गंभीर दशा में, सभी गंभीर रोगियों में शुगर का अनियंत्रित होना सच्चाई है.”
डॉ रे

वह बताते हैं, एक और परिकल्पना यह है कि वायरस पैंक्रियाज में ACE रिसेप्टर्स के साथ खुद को जोड़ लेता है और यह शुगर के नियंत्रण की कमी का कारण बन सकता है.

डॉ. रे के अनुसार, “क्रिटिकल केयर का एक मुख्य प्रोटोकोल शुगर कंट्रोल है, लेकिन यह कोई नई या अजीब बात नहीं है.” वह कहते हैं कि दुनिया को थोड़ा समय लगा क्योंकि फैलाव बहुत तेज था, कड़ियों को जोड़ने में कुछ समय लगा लेकिन अब बीमारी के बारे में कुछ बातें पता हैं. “यह पूरी तरह नया नहीं है, हम बुनियादी पैटर्न जानते हैं लेकिन कुछ प्रतिक्रियाओं और बारीकियों पर नजर रखने की जरूरत है.” वह कहते हैं इन मामलों में मौतों की संख्या ज्यादा लगती है क्योंकि हम उन्हें पूर्ण संख्या के रूप में देख रहे हैं, लेकिन वास्तविक प्रतिशत इतना ज्यादा नहीं है.

बड़ी समस्या है ब्लड क्लॉटिंग

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डॉ रे कहते हैं, "COVID-19 में मुख्य समस्या यह है कि यह ब्लड वेसेल (रक्त वाहिकाओं) को प्रभावित कर रहा है और ब्लड क्लॉटिंग का कारण बनता है. सेप्सिस में भी ऐसा ही होता है, और COVID-19 में रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त होने से अंगों तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जो तब प्रतिकूल प्रतिक्रिया का कारण बनती है."

डॉ. रे का कहना है कि ब्लड क्लॉटिंग (खून के थक्के जमना) वाले मरीजों का अनुपात और गंभीरता “COVID-19 में काफी ज्यादा है.” यह ऊंची मृत्यु दर के कारकों में से एक है.

रक्त वाहिकाओं की दीवारें भी क्षतिग्रस्त हो रही हैं और रुकावटों की वजह बन रही हैं. “इससे मरीजों का एक छोटा हिस्सा स्ट्रोक और दिल के दौरे का शिकार हो रहा है.”

COVID-19 और H1N1 दोनों में कई मरीजों के लंग टिश्यू डैमेज हो जाते हैं. COVID-19 में फर्क यह है कि इसमें क्लॉटिंग से स्माल ब्लड वेसेल को नुकसान पहुंचता है, और अंगों में ऑक्सीजन पहुंचने में रुकावट पैदा होती है. “होता यह है कि हमारे फेफड़ों से ऑक्सीजन रक्त वाहिकाओं और फिर टिश्यू व छोटी वाहिकाओं में फैलती है और इन्हीं वाहिकाओं में क्लॉटिंग हो रही है.”

बहुत कुछ जानना है, बहुत कुछ सीखना है

वायरस की हमारी समझ जनवरी से अब तक बहुत बढ़ चुकी है. अब इसके बारे में ज्यादा जागरुकता है और जबकि हेल्थकेयर वर्कर अभी भी इससे हर रोज लड़ रहे हैं, इसे लेकर अब ज्यादा तैयारी है.

फिर से बता दें कि, COVID-19 एक शातिर वायरस है, और हम इसका जितना ज्यादा अध्ययन कर रहे हैं, उतना ही हम इसकी विभिन्न प्रतिक्रियाओं के बारे में जान रहे हैं. दुनिया भर में, सटीक आंकड़ों को इकट्ठा करने और इस बीमारी की गंभीरता को नियंत्रित करने के लिए मुमकिन तरीके ढूंढने की कोशिश हैं. भारत में, हम 10 लाख मामले पार कर चुके हैं और बीमारी के वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत को कम नहीं समझा जा सकता.

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